शनिवार, 6 जनवरी 2024

शिवाजी महाराज का ऐसा खौफ था की अफ़ज़ल ने अपनी 64 बीवियों का किया था क़त्ल

क्या आपने सुना है कि कोई शासक अपनी 64 पत्नियों को सिर्फ़ इसलिये मार डाले कि कहीं उसके मरने के बाद वे दोबारा शादी न कर लें… है ना आश्चर्यजनक बात!!! लेकिन सच है…
यूँ तो कर्नाटक के बीजापुर में गोल गुम्बज और इब्राहीम रोज़ा जैसी कई ऐतिहासिक इमारतें और दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन एक स्थान ऐसा भी है जहाँ पर्यटकों को ले जाकर इस्लामी आक्रांताओं के कई काले कारनामों में से एक के दर्शन करवाये जा सकते हैं। बीजापुर-अठानी रोड पर लगभग 5 किलोमीटर दूर एक उजाड़ स्थल पर पाँच एकड़ में फ़ैली यह ऐतिहासिक कत्लगाह है। “सात कबर” (साठ कब्र का अपभ्रंश) ऐसी ही एक जगह है। इस स्थान पर आदिलशाही सल्तनत के एक सेनापति अफ़ज़ल खान द्वारा अपनी 64 पत्नियों की हत्या के बाद बनाई गई कब्रें हैं। इस खण्डहर में काले पत्थर के चबूतरे पर 64 कब्रें बनाई गई हैं।
इतिहास कुछ इस प्रकार है कि एक तरफ़ औरंगज़ेब और दूसरी तरफ़ से शिवाजी द्वारा लगातार जारी हमलों से परेशान होकर आदिलशाही द्वितीय (जिसने बीजापुर पर कई वर्षों तक शासन किया) ने सेनापति अफ़ज़ल खान को आदेश दिया कि इनसे निपटा जाये और राज्य को बचाने के लिये पहले शिवाजी पर चढ़ाई की जाये। हालांकि अफ़ज़ल खान के पास एक बड़ी सेना थी, लेकिन फ़िर भी वह ज्योतिष और भविष्यवक्ताओं पर काफ़ी भरोसा करता था। शिवाजी से युद्ध पर जाने के पहले उसके ज्योतिषियों ने उसके जीवित वापस न लौटने की भविष्यवाणी की। उसी समय उसने तय कर लिया कि कहीं उसकी मौत के बाद उसकी पत्नियाँ हिन्दुओ से दूसरी शादी न कर लें, सभी 64 पत्नियों को मार डालने की योजना बनाई।
अफ़ज़ल खान अपनी सभी पत्नियों को एक साथ बीजापुर के बाहर एक सुनसान स्थल पर लेकर गया। जहाँ एक बड़ी बावड़ी स्थित थी, उसने एक-एक करके अपनी पत्नियों को उसमें धकेलना शुरु किया, इस भीषण दुष्कृत्य को देखकर उसकी दो पत्नियों ने भागने की कोशिश की लेकिन उसने सैनिकों को उन्हें मार गिराने का हुक्म दिया। सभी 64 पत्नियों की हत्या के बाद उसने वहीं पास में सबकी कब्र एक साथ बनवाई।
आज की तारीख में इतना समय गुज़र जाने के बाद भी जीर्ण-शीर्ण खण्डहर अवस्था में यह बावड़ी और कब्रें काफ़ी ठीक-ठाक हालत में हैं। यहाँ पहली दो लाइनों में 7-7 कब्रें, तीसरी लाइन में 5 कब्रें तथा आखिरी की चारों लाइनों में 11 कब्रें बनी हुई दिखाई देती हैं और वहीं एक बड़ी “आर्च” (मेहराब) भी बनाई गई है, ऐसा क्यों और किस गणित के आधार पर किया गया, ये तो अफ़ज़ल खान ही बता सकता है। वह बावड़ी भी इस कब्रगाह से कुछ दूर पर ही स्थित है। 
अफ़ज़ल खान ने खुद अपने लिये भी एक कब्र यहीं पहले से बनवाकर रखी थी। हालांकि उसके शव को यहाँ तक नहीं लाया जा सका और मौत के बाद प्रतापगढ़ के किले में ही उसे दफ़नाया गया था, लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि वह अपनी मौत को लेकर बेहद आश्वस्त था, भला ऐसी मानसिकता में वह शिवाजी से युद्ध कैसे लड़ता? हिन्दुओ के शान महान योद्धा शिवाजी के हाथों अफ़ज़ल खान का वध प्रतापगढ़ के किले में 1659 में हुआ.

250 साल पुरानी है भारतीय सेना की ‘मराठा लाइट इन्फेंट्री’ रेजिमेंट, 7 खास बातें

                  मराठा लाइट इन्फेंट्री का प्रतीक चिन्ह 

भारतीय सेना की हर रेजिमेंट अपने आप में खास है और वीरता, शौर्य व पराक्रम में लिपटा हुआ इतिहास सहेजे है। सेना की सुसज्जित मराठा लाइट इन्फेंट्री रेजिमेंट 4 फरवरी, 2018 को अपनी स्थापना के ढाई सौ साल पूरे कर चुकी है। हर युद्ध में अपने अदम्य साहस का परचम लहराती इस रेजिमेंट से जुड़ी कुछ खास बातें आज हम आपको बता रहे हैं-

प्रत्येक वर्ष 4 फरवरी को ‘मराठा लाईट इन्फेंट्री डे’ के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष भी यह दिवस रेजिमेंट ने धूमधाम से मनाया। सेना प्रमुख बिपिन रावत की मौजूदगी में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कहा जाता है कि 1670 में इसी दिन छत्रपति शिवाजी ने प्रसिद्ध कोंडाना किले पर कब्ज़ा किया था। इसे आज महाराष्ट्र में सिंहगढ़ किले के रूप में जाना जाता है।
रेजिमेंट की पहली बटालियन 1768 में ‘बोम्बे सिपॉय’ की दूसरी बटालियन के रूप में बनाई गई थी। जिसे बाद में तीसरी ‘जंगली पलटन’ के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।

मिल चुके हैं दो ‘विक्टोरिया क्रॉस’  

मराठा लाइट इन्फेंट्री के दो सैनिकों-यशवंत घाडगे तथा ‘सिपॉय’ नामदेव जाधव को ब्रिटिश समय के सर्वोच्च सम्मान ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित किया जा चुका है। इसके आलावा रेजिमेंट को अभी तक ढेरों वीरता पुरस्कार मिल चुके हैं।

लाइट इन्फैंट्री का ख़िताब पाने वाली पहली रेजिमेंट

1841 में अफगान युद्ध के दौरान ‘लाइट इन्फैंट्री’ का खिताब हासिल करने वाली सेना की पहली इन्फैन्ट्री रेजिमेंट भी थी। यह 56 Battle honours और 10 Theatre Honours प्राप्त कर चुकी है। यह भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सबसे सुसज्जित रेजिमेंटों में से एक है। मराठा लाइट इन्फैंट्री की वीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस रेजिमेंट ने प्रथम विश्व युद्ध में 15 युद्ध सम्मान हासिल किए। 
दूसरे विश्व युद्ध में, रेजिमेंट की ताकत 6 से बढ़ाकर 13 बटालियन कर दी गई। आज रेजिमेंट में करीब 21 नियमित बटालियन, चार राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन और दो क्षेत्रीय सेना बटालियन हैं। मराठा लाइट इन्फैंट्री एकमात्र रेजिमेंट है जिसने भारतीय सेना के लिए विशेष बलों की दो बटालियनों का योगदान दिया है।
रेजिमेंट में 10 मैकेनाइज्ड  इन्फैंट्री रेजिमेंट, दो आर्टिलरी (तोपखाने) रेजिमेंट और सेना में एक पैराशूट (हवाई रक्षा) रेजिमेंट के साथ संबद्धता है। यही नहीं रेजिमेंट में भारतीय नौसेना पोत (आईएनएस) मुंबई,  20 वीं स्क्वाड्रन वायु सेना (सुखोई) और दमन और दीव में भारतीय तटरक्षक वायु स्टेशन के साथ एक अंतर-सेवा संबद्धता भी है।
मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट’ 250 वर्षों युद्ध के मैदान में वीरता के झंडे गाड़ती रही है।  यह छत्रपति शिवाजी और मराठा योद्धाओं से अपनी प्रेरणा लेकर आए हैं जो गुरिल्ला युद्ध में निपुण थे |