बुधवार, 22 नवंबर 2017

ब्राह्मण विदेशी है पढ़े....

#ब्राह्मण_विदेशी_है_कितना_सच?
1. ऋग्वेद में श्लोक 10 में लिखा है कि हम (वैदिक ब्राह्मण ) उत्तर ध्रुव से आये हुए लोग है। जब आर्य व् अनार्यो का युद्ध हुआ ।
2. The Arctic Home At The Vedas बालगंगाधर तिलक (ब्राह्मण) के द्वारा लिखी पुस्तक में मानते है कि हम बाहर आए हुए लोग है ।
3. जवाहर लाल नेहरु ने (बाबर के वंशज फिर कश्मीरी पंडित बने) उनकी किताब Discovery of India में लिखा है कि हम मध्य एशिया से आये हुए लोग है। यह बात कभी भूलना नही चाहिए। ऐसे 30 पत्र इंदिरा जी को लिखे जब वो होस्टल में पढ़ रही थी।
4. वोल्गा टू गंगा में “राहुल सांस्कृतयान” (केदारनाथ के पाण्डेय ब्राहम्ण) ने लिखा है कि हम बाहर से आये हुए लोग है और यह भी बताया की वोल्गा से गंगा तट (भारत) कैसे आए।
5. विनायक सावरकर ने (ब्राम्हण) सहा सोनरी पाने “इस मराठी किताब में लिखा की हम भारत के बाहर से आये लोग है।
6. इक़बाल “काश्मीरी पंडित ” ने भी जिसने “सारे जहा से अच्छा” गीत लिखा था कि हम बाहर से आए हुए लोग है।
7. राजा राम मोहन राय ने इग्लेंड में जाकर अपने भाषणों में बोला था कि आज मै मेरी पितृ भूमि यानि अपने घर वापस आया हूँ।
8. मोहन दास करम चन्द गांधी (वेश्य) ने 1894 में दक्षिणी अफ्रीका के विधान सभा में लिखे एक पत्र के अनुसार हम #भारतीय होने के साथ साथ #युरोशियन है हमारी नस्ल एक ही है इसलिए अग्रेज शासक से अच्छे बर्ताव की अपेक्षा रखते है।
9. ब्रह्म समाज के नेता सुब चन्द्र सेन ने 1877 में कलकत्ता की एक सभा में कहा था कि अंग्रेजो के आने से हम सदियों से बिछड़े चचेरे भाइयों का (आर्य ब्रह्मण और #अंग्रेज ) पुनर्मिलन हुआ है।
इस सन्दर्भ में #अमेरिका के Salt lake City स्थित युताहा #विश्वविधालय (#University_of_Utaha’ #USA) के मानव वंश विभाग के #वैज्ञानिक माइकल बमशाद और #आंध्र_प्रदेश के विश्व विद्यापीठ #विशाखापट्टनम के #Anthropology विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा सयुक्त तरीको से 1995 से 2001 तक लगातार 6 साल तक भारत के #विविध #जाति-#धर्मो और #विदेशी #देश के लोगो के #खून पर किये गये #DNA के #परिक्षण से एक #रिपोर्ट तैयार की। जिसमें बता गया कि भारत देश की ब्राह्मण जाति के लोगों का #DNA_99_96 %, #क्षत्रिय जाति के लोगों का #DNA_99.88% और वेश्य-बनिया जाति के लोगो का #DNA_99:86% #मध्य_यूरेशिया के पास जो “#काला_सागर ’#Blac_Sea” है। वहां के लोगो से मिलता है। इस रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकालता है कि #ब्राह्मण, #क्षत्रिय और #वैश्य_बनिया #विदेशी लोग है और #एस_सी, #एस_टी और ओबीसी में बंटे लोग (कुल 6743 जातियां) और भारत के #धर्म_परिवर्तित #मुसलमान, #सिख, #बुध, #ईसाई #आदि #धर्मों के #लोगों का #DNA आपस में #मिलता है। जिससे #साबित होता है कि एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्म परिवर्तित लोग #भारत के #मूलनिवासी है। इससे यह भी पता चलता है कि एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्मपरिवर्तित लोग एक ही वंश के लोग है। एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्म परिवर्तित लोगों को आपस में जाति के आधार पर #बाँट कर ब्राह्मणों ने सभी मूलनिवासियों पर झूटी #धार्मिक_गुलामी थोप रखी है। 1900 के शुरुआत से आर्य समाज ब्राह्मण जैसे संगठन बनाने वाले इन लोगो ने 1925 से #हिन्दु नामक चोला #पहनाकर घुमाते आ रहे है। उक्त बात का विचार हमे बहुत ही गहनता से करने की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

अटल जी हो या आडवानी,भाजपा मे सबकी इज्जत पर फिरता पानी.

नाम मिट गया है उसका
भा.ज.पा के पटल से
गौरवान्वित होते थे कभी
ये सारे उस अटल से
मर चुका है इन सबकी
आँखों का भी वह पानी
हाशिये पर खड़ा हुआ है
इनका अपना आडवाणी
सम्मान नहीं मिलता है जैसे
घर में बूढ़ी मौसी को
ये भी भूल चुके हैं वैसे
मुरली मनोहर जोशी को
अता पता नहीं पार्टी में
उस नेता जसवंत का
कहीं सूचक तो नहीं
ये भा.ज.पा के अंत का
सावन के अंधों को बस
मोदी ही मोदी दिखता है
चाय बेचने बाले का
करोड़ों में सूट बिकता है
जनता से ये कहते थे
काला धन लाने वाले हैं
थोड़ा सा और सब्र करो
अच्छे दिन आने वाले हैं
हमको क्या पता था कि
ऐसे अच्छे दिन आएंगे
हिलने लगेगी ये धरती
और फांसी किसान लगाएंगे
यूं ही नहीं सब तुमको
फेंकू फेंकू कहते हैं
झूठ की नीव पर बने भवन
चरमरा कर ढहते हैं
बातें करते हो तुम तो
नारी के उत्थान की
खूब पैरवी करते हो
नारी के सम्मान की
लेकिन आज भी नारी की
दोनों आँखें बहती हैं
जुल्म तुम्हारे ही घर में
जशोदा बेन सहती है
पहचान लेते हैं हम तो
उड़ती चिड़िया के पर को
देश को क्या चलाओगे
जब चला सके न तुम घर को
क्षमा करना ,दिल दुखा हो
अगर किसी भी व्यक्ति का
संविधान ने दिया मुझको
अधिकार ये अभिव्यक्ति का....!!!

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

भगत सिंह की फांसी पर फैला भ्रम

#भगतसिंह की फांसी को लेकर दशकों से ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि गांधी चाहते तो भगतसिंह की जान बच सकती थी.
इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए किसी #गोडसे या किसी कांग्रेसी को पढ़ने के बजाय भगतसिंह और उनके बारे में लिखा साहित्य पढ़ा जाना ज़रूरी है.
जब भगतसिंह ने #सांडर्स को मारकर #लालाजी की मौत का बदला लेने के बाद असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया तब #चंद्रशेखर आज़ाद ने प्लान तैयार किया कि किसी तरह और किन रास्तों से बम विस्फोट करने के बाद निकालकर भागा जा सकता है.
उन्होंने ये प्लान भगतसिंह को बताया और भगतसिंह ने इस पर अमल करने से साफ़ इंकार कर दिया. भगतसिंह गिरफ्तार होना चाहते थे.
इस मुद्दे पर आज़ाद से भगतसिंह की गर्मागर्म बहस भी हो गई.
भगतसिंह का कहना था ये बम हम किसी की जान लेने के लिए नहीं फेंकने वाले हैं.
हमारा मकसद है लोगों को जगाना और उस मकसद को मैं गिरफ्तार होकर ज़्यादा बेहतर तरीके से पूरा कर सकता हूँ.
केस चलेगा,
जिरह होगी.
उस जिरह में हमें अपनी बात रखकर देशवासियों तक पहुँचाने का मौका मिलेगा.
इस पर आज़ाद का कहना था कि केस का मतलब होगा मौत की सजा.
भगतसिंह ने जो कहा वो उनके जैसा कोई #वीर ही कह सकता था.
वो बोले मैं जान देने के लिए ही गिरफ्तार होना चाहता हूँ.
मैं ज़िंदा रहकर आज़ादी के आंदोलन में उतना योगदान नहीं दे पाउँगा जितना मरकर दे सकता हूँ.
भगतसिंह बोले मैं तो चाहता हूँ मुझे फांसी की सजा हो और मैं हँसते हँसते मौत को गले लगा लूँ.
मेरी मौत कई भगतसिंह पैदा कर देगी.
दोनों महान क्रांतिकारियों के बीच बहुत बहस हुई. लेकिन भगतसिंह अपनी ज़िद के पक्के थे.
आज़ाद को उनके आगे हार माननी पड़ी.
फिर वही हुआ जो भगतसिंह चाहते थे.
उनकी उनकी 116 दिन की भूख हड़ताल और उसके बाद फांसी ने पूरे देश को झकझोर दिया.
भगतसिंह की शहादत ने आज़ादी के आंदोलन की पुख्ता ज़मीन तैयार कर दी.
उसके बाद तो देश आज़ादी से कम पर मानने को तैयार ही नहीं हुआ.
भगतसिंह के ट्रायल और भूख हड़ताल के दौरान कांग्रेस के सारे नेता भगतसिंह और उनके साथियों के बचाव के लिए प्रयासरत रहे.
63 दिन की भूख हड़ताल के बाद असेंबली केस में भगतसिंह के साथी #जतींद्र नाथ दास के निधन के विरोध में #मोहम्मद आलम और #गोपीचंद भार्गव ने पंजाब असेंबली से इस्तीफा दे दिया.
इन क्रांतिकारीयों के साथ जेल में अमानवीय व्यवहार के विरोध में #मोतीलाल नेहरू ने सेंट्रल असेंबली में प्रस्ताव पास कराया.
#जवाहरलाल नेहरू ने भगतसिंह को राजनैतिक कैदी का दर्ज़ा दिलवाने के लिए प्रयास किये.
वो भगतसिंह से मिलने जेल भी गए.
कांग्रेस ने भगत सिंह की भूख हड़ताल समाप्त कराने के लिए प्रस्ताव पास किया और भगत सिंह के #पिता और #कांग्रेस के निवेदन पर भगतसिंह ने 116 दिन के बाद अपनी भूख हड़ताल समाप्त की.
जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना ने सार्वजनिक रूप से भगतसिंह की सराहना और समर्थन किया.
सभी की डिटेल में ना जाते हुए हम सिर्फ #गांधी के प्रयास को समझने की कोशिश करते हैं.
ये सही है कि अपने हिंसा विरोधी सिद्धांतों के चलते गांधी जी खून का बदला खून से लेने के खिलाफ थे.
लेकिन भगतसिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए किये जा रहे कांग्रेस के प्रयासों में उन्होंने कभी बाधा नहीं डाली.
अगर वो नहीं चाहते तो कांग्रेस इतनी प्रो-एक्टिव होकर भगतसिंह और उनके साथियों के समर्थन में नहीं खड़ी होती.
प्रिवी कौंसिल में कांग्रेस द्वारा दायर भगतसिंह और उनके साथियों की फांसी की सजा की माफ़ी की अपील निरस्त होने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष प. #मदन मोहन मालवीय ने इरविन के सामने दया याचिका दायर की.
एक अपील गांधीजी को भेजी गई.
#इरविन ने अपने नोट्स में लिखा है-
"While returning Gandhiji asked me if he could talk about the case of Bhagat Singh, because newspapers had come out with the news of his slated hanging on March 24th. It would be a very unfortunate day because on that day the new president of the Congress had to reach Karachi and there would be a lot of hot discussion. I explained to him that I had given a very careful thought to it but I did not find any basis to convince myself to commute the sentence. It appeared he found my reasoning weighty".
इस सारी बहस में मुख्य बात ये है कि भगतसिंह चाहते थे कि उन्हें फांसी हो.
अगर उन्हें बचना ही होता तो वो चंद्रशेखर आज़ाद की योजना को स्वीकार कर सकते थे.
सनद रहे कि चंद्रशेखर ऐसी योजनाएं बनाने में माहिर थे और जीवन पर्यन्त कभी अंग्रेज़ों के हाथ नहीं लगे.
सबसे बड़ी बात, भगतसिंह या चंद्रशेखर आज़ाद या #सुभाषचन्द्र बोस की तस्वीरें लगाकर खुद को राष्ट्रभक्त साबित करने की कोशिश करने वाले संघी परिवार ने कभी आवाज क्यों नही उठाई??

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

कुर्मीयो का क्षत्रिय दावा,कितना सच,कितना झुठ

कुर्मियों का क्षत्रिय दावा कितना सच -कितना झूठ
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किसान कुर्मी (कुनबी)  की भी हालत  कुछ अच्छी नहीं थी. क्रिमिनल ट्राईब की तरह  इस जाति को भी अंग्रेजी सरकार ने  नौकरी से वंचित किया था.  तब 1894 में लखनऊ में  कुरमी सदर सभा की स्थापना हुई,  आन्दोलन हुआ और कुर्मियों को नौकरी बहाल हुई.
जाति भेद और छुआछूत की मारसे बचनेके लिए 1909 में चुनार (उत्तर प्रदेश)  महासभा में  कुर्मी के साथ क्षत्रिय शब्द जोडा गया . जब कि पहले जाति का नाम ऐसा नहीं था  कुर्मी जाति  का प्राचीन  नाम  शायद कुडमी(कुलमी)  था उत्तर-प्रदेश मध्य -प्रदेश में इसकीभनक मिलती है झारखंड क्षेत्र में इनकी  मातृ भाषा कुड़माली में  इस जाति कानाम कुड़मी है.  इग्लिश में ड़ के लिए कोई अक्षर नहीं है. इसलिए अंग्रेजी मे इस जाति का   नाम  KURMI  लिखा गया और भारतीय  इये  कूर्मि पढ़ने लगे. वेद पुराण शास्त्र का तुवि कूर्मि(ईन्द्र) , कूर्म कश्यप , कूर्म कृषि  से समानता होने से  कुरिमी इनकी वंशज और क्षत्रिय मानना शुरू किया  और अपने पूर्व पुरुष का  महतो उपाधि को छोड़कर  सिंह, वर्मा, पटेल  आदि उपाधि  धारण किया  ताकि शूद्र वर्ण से  छुटकारा मिले .  क्षत्रिय के  ढेर सारे गौत्र  में से  इनको सिर्फ कश्यप गोत्र मिला.  हिन्दुओं में सगोत्र विवाह वर्जित है, मात्र  कुर्मियों में  एक कश्यप गोत्र में विवाह चालू है. इसीलिए  झारखण्डी कुड़मी (कुर्मी)  अपने टोटेमिक वंश को छोड़ते  नहीं .   हैं .

शिवाजी :-  शिवाजी1627-1687)  छत्रपति महाराज थे  तो उनके वंशज  कुनबी  कूर्मिक्षत्रिय हैं
शिवाजी अपने अदम्य पुरुषार्थ से  महाराजा तो बन गए , परन्तु राजा मानने में  द्विजाति सवर्णों में शंका थी, क्योंकि उनका जनेऊ नहीं हुआ था. क्षत्रियों का  का  जनेऊ संस्कार और राज्या भिषेक था .  मराठा चितपावन ब्राह्मणें ने  शिवाजी को  शूद्र कुुनबी किसान का वशज माना और क्षत्रिय वर्ण का संस्कार न देने का  फैसला किया .
मनुस्मृति के  ये दो द्रष्टव्य विधान ;-
शूद्राय  मतिं ददयाग्रोच्छिष्ट  न हविष्कृतम
न च  अस्य उपदिश :  धर्म न चास्य व्रतमासिशेत(४/८०)
शूद्र को ग्यान हविष,  धर्मवाणी व्रत (जनेऊ संस्कार) नहीं देना चाहिए
योद्दयस्य धर्ममाचष्टे  यशेयदिशाति  व्रतम
सोs संवृतं  नाक  तम: सह तनैव मज्जति (४/८१)
जो इस  (शूद्र) को  धर्म -उपदेश,  व्रतसंस्कार देगा , वह (पुरोहित)  उस शूद्र के साथ  असंवृत नरक दंड भोगेगा.

शिवाजी को धर्न के अनुसारराजा बनाने के लिए  उनके एक कायस्थ मंत्री  बालाजी  अबजी वाराणसी के एक  पतित पंडित  गागाभट्ट को तीन लाख रुपए देकर अभिषेकके लिए राजी कराया  उसने प्रमाण दिया कि शिवाजी चित्तोर के  सिसौदिया राजपूत  राणाप्रताप के वंशज हैं  यानी जन्मसे वह  क्षत्रिय कुल से  हैं , शूद्र कुल से नहीं हैं   तो  ब्रत,अभिषेकका कोई पाबंदी नहीं
अत: शिवाजी का व्रतऔर अभिषेक  ४७ वर्ष की आयु में हुआ ,किन्तु वाद में गागाभट्ट के सहयोग से बनायी गई  वंशावली झूठी निकली  , क्योंकि  शिवाजी  और राणाप्रताप के गोत्र  इतिहासकारों ने अलग -अलग  प्रमाणित
किए हैं.
छत्रपति शाहूजी महाराज(१८७४-१९२२)
१८९९ में  ब्राह्मण को दान करते  वक्त देखा कि  वह बिना स्नान किए आया था.    शाहूजी महाराज  ने पूछा तो उसने  बताया कि  शद्र राजा से दान  लेने में नहाना जरूरी नहीं .  शाहू जी बोले वे शिवाजी के वंशज क्षत्रियहैं उसने कहा शिवाजी  एक  शूद्र कुनबी किसान का बेटा  अक्षत्रिय राजा था  ब्राह्मण समाजऔर शंकराचार्य की मान्यता बिना किसी को क्षत्रियनहीं माना जाएगा
राजाजीसदमा से उठे और देखा कि उनके ७१ पदाधिकारियों में  से  ६१ब्राह्मण थे १९०२ में उन्होंने अब्राह्मण केलिए  ५०  प्रतिशत आरक्षण दिया  अपने कोल्हापुर राज्य में  इसलिए उन्हें आरक्षण का जनक कहा जाता है.उन्होंने जनेऊ छोडा़,व्रत संस्कार छोड दिया. मठकी संपत्ति जप्त कर  साधारण वर्गों की  शिक्षा में विनीयोग किया  तिलक की पत्रिका केशरी ने उन्हें हिन्दू विरोधी बताया  उनको मारने के लिए उनकी कारपर बम फेका गया ,पर वे बच गए.
अखिल भारतीय कूर्मिक्षत्रिय महासभा  के १९१९  के  अधिवेशन में   उनको सभापति बनाकर  राजर्षि उपाधि  दिया गया .  क्या उनको ब्राह्मण पदोन्नति मिला ?
अरविंद स्वामी  विवेकानंद  आदि महामनिषियों  को भी शूद्र संतान कहा गया .  उनको ब्राह्मण पदोन्नति नहीं मिली. 
अभी मातृभूमि की  रक्षा के लिए शहीद  हे जीने वाले जवानों को  हिन्दू धर्म क्षत्रिय की मान्यता नहीं दे रहा है.
उत्तर भारत में एक कहावत  प्रचलित है :-
भले जात कुनबीन कि खुरपि  हाथ!
खेत निरावे अपने पी  के साथ !

कुर्मी (कुनबी ) औरतों का  अपने मरद के साथ  खेत में काम करना एक आम बात है.  इस  किसान जाति में  कोई कभी  राज, महाराजा हुए होंगे , कोई सिपाई सैनिक होंगे , आम कुर्मी तो  किसान ही है.  इन्हें कोई ब्राह्मण समाज या  शंकराचार्य ने  क्षत्रिय की मान्यता नहीं दी है.  अपने आप को  क्षत्रिय बोलने से, क्षत्रिय पदवी धारण करने से  बगैर क्षत्रिय संस्कार के  हिन्दू धर्म में क्षत्रिय की मान्यता  नहीं मिलने वाली है. 
कुर्मी और  जनेऊं (उपवीत ) :-
कुरमी सदर सभा के  संस्थापक सभापति  बाबू रामधीन सिंह चौधरी  १८९६ में  लखनऊ में जनेऊं पहने , तो ब्राह्मणों ने उनकाजनेऊं तोड़  डाला.  ऐसे कुर्मियों का जनेऊं  गोण्डा में १९०९ में,  बाराबंकी में १९२५ मे,  आजमगढ़ में १९२६ में, पश्चिम बंगाल में २९२९ में तोडा़ गया .  बंगाल को नौपाडा गांव के एक शिक्षक  कुंज महतो  जनेऊं पहनकर  वागदा दुर्गा पूजा  देखने गए .  ब्राह्मणों ने  उन्हें पकड़कर जनेऊं काट दिया , गंजा बनाया और  मुंह में कालीख पेतकर  घुमाया.  मामला केर्ट में पहुंचा . ब्राह्मण विचारपीठ ने  अपराधीको पच्चीसरुपए  जुर्मानाकरके छोड दिया. इसकी प्रतिक्रियामें  कुर्मियों में जनेऊं पहनने का  होड लग गया ,परन्तु धारण करने पर  सामाजिक स्थिति नहीं बदली तो  मोह भंग हो गया.
शूद्र का वर्गीकरण :-
शूद्र का ३ वर्गों में  वर्गीकरण  किया गया है -१-  जलचल -  जिनका पका अन्न , जल भोज्य है.
२- अचल - जिनका  पकीयी खाना ऐर जल  अग्रहणीय,  किन्तु उनका पुरोहित होते हैं
३- अछूत- छूते नहीं हैं तो  उनका पुरोहित बनने का तो  सवाल ही नहीं.

व्यास स्मृति के अनुसार  कुर्मी तीसरे का ान का शूद्र था.  फिर सनातन धर्म बदला . उनके पिता के नाम  की स्मृति  पराशर स्मृति  में कुर्मी को दूसरे पायदान के शूद्र पर पदोन्नति हुई.  यथा -
आभीर: कुर्मणा लोद्र:  कैवर्त च नापिता: !पंच शूद्रा  प्रशश्यते  षपठोपिद्विज  सेविका: !!
अहीर, कुर्मी, लोध, कैवर्त और नाई ये पांच शूद्र द्विजों्की  मन से सेवा करने  के कारण  प्रशंसनीय हैं .
पराशर -स्मृति कहता है - पतितौपि द्विजो श्रेष्ठ:  नच शूद्रो जितेन्द्रिय:!
  आओ कुर्मी संतानों !  देखो ,  पढो़ वर्ण -व्यवस्था तुम्हारा क्या हाल किया है  तो उस व्यलस्था का समर्थक बनकर  क्यों उसके दूसरे वर्ण क्षत्रिय  की मरीचिका के पीछे दौड़ लगा रहे हो!
   इस क्षत्रिय और शूद्र पुंछ को काटकर फेको और आगे बढो़!
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