रविवार, 1 अक्टूबर 2017

कुर्मीयो का क्षत्रिय दावा,कितना सच,कितना झुठ

कुर्मियों का क्षत्रिय दावा कितना सच -कितना झूठ
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किसान कुर्मी (कुनबी)  की भी हालत  कुछ अच्छी नहीं थी. क्रिमिनल ट्राईब की तरह  इस जाति को भी अंग्रेजी सरकार ने  नौकरी से वंचित किया था.  तब 1894 में लखनऊ में  कुरमी सदर सभा की स्थापना हुई,  आन्दोलन हुआ और कुर्मियों को नौकरी बहाल हुई.
जाति भेद और छुआछूत की मारसे बचनेके लिए 1909 में चुनार (उत्तर प्रदेश)  महासभा में  कुर्मी के साथ क्षत्रिय शब्द जोडा गया . जब कि पहले जाति का नाम ऐसा नहीं था  कुर्मी जाति  का प्राचीन  नाम  शायद कुडमी(कुलमी)  था उत्तर-प्रदेश मध्य -प्रदेश में इसकीभनक मिलती है झारखंड क्षेत्र में इनकी  मातृ भाषा कुड़माली में  इस जाति कानाम कुड़मी है.  इग्लिश में ड़ के लिए कोई अक्षर नहीं है. इसलिए अंग्रेजी मे इस जाति का   नाम  KURMI  लिखा गया और भारतीय  इये  कूर्मि पढ़ने लगे. वेद पुराण शास्त्र का तुवि कूर्मि(ईन्द्र) , कूर्म कश्यप , कूर्म कृषि  से समानता होने से  कुरिमी इनकी वंशज और क्षत्रिय मानना शुरू किया  और अपने पूर्व पुरुष का  महतो उपाधि को छोड़कर  सिंह, वर्मा, पटेल  आदि उपाधि  धारण किया  ताकि शूद्र वर्ण से  छुटकारा मिले .  क्षत्रिय के  ढेर सारे गौत्र  में से  इनको सिर्फ कश्यप गोत्र मिला.  हिन्दुओं में सगोत्र विवाह वर्जित है, मात्र  कुर्मियों में  एक कश्यप गोत्र में विवाह चालू है. इसीलिए  झारखण्डी कुड़मी (कुर्मी)  अपने टोटेमिक वंश को छोड़ते  नहीं .   हैं .

शिवाजी :-  शिवाजी1627-1687)  छत्रपति महाराज थे  तो उनके वंशज  कुनबी  कूर्मिक्षत्रिय हैं
शिवाजी अपने अदम्य पुरुषार्थ से  महाराजा तो बन गए , परन्तु राजा मानने में  द्विजाति सवर्णों में शंका थी, क्योंकि उनका जनेऊ नहीं हुआ था. क्षत्रियों का  का  जनेऊ संस्कार और राज्या भिषेक था .  मराठा चितपावन ब्राह्मणें ने  शिवाजी को  शूद्र कुुनबी किसान का वशज माना और क्षत्रिय वर्ण का संस्कार न देने का  फैसला किया .
मनुस्मृति के  ये दो द्रष्टव्य विधान ;-
शूद्राय  मतिं ददयाग्रोच्छिष्ट  न हविष्कृतम
न च  अस्य उपदिश :  धर्म न चास्य व्रतमासिशेत(४/८०)
शूद्र को ग्यान हविष,  धर्मवाणी व्रत (जनेऊ संस्कार) नहीं देना चाहिए
योद्दयस्य धर्ममाचष्टे  यशेयदिशाति  व्रतम
सोs संवृतं  नाक  तम: सह तनैव मज्जति (४/८१)
जो इस  (शूद्र) को  धर्म -उपदेश,  व्रतसंस्कार देगा , वह (पुरोहित)  उस शूद्र के साथ  असंवृत नरक दंड भोगेगा.

शिवाजी को धर्न के अनुसारराजा बनाने के लिए  उनके एक कायस्थ मंत्री  बालाजी  अबजी वाराणसी के एक  पतित पंडित  गागाभट्ट को तीन लाख रुपए देकर अभिषेकके लिए राजी कराया  उसने प्रमाण दिया कि शिवाजी चित्तोर के  सिसौदिया राजपूत  राणाप्रताप के वंशज हैं  यानी जन्मसे वह  क्षत्रिय कुल से  हैं , शूद्र कुल से नहीं हैं   तो  ब्रत,अभिषेकका कोई पाबंदी नहीं
अत: शिवाजी का व्रतऔर अभिषेक  ४७ वर्ष की आयु में हुआ ,किन्तु वाद में गागाभट्ट के सहयोग से बनायी गई  वंशावली झूठी निकली  , क्योंकि  शिवाजी  और राणाप्रताप के गोत्र  इतिहासकारों ने अलग -अलग  प्रमाणित
किए हैं.
छत्रपति शाहूजी महाराज(१८७४-१९२२)
१८९९ में  ब्राह्मण को दान करते  वक्त देखा कि  वह बिना स्नान किए आया था.    शाहूजी महाराज  ने पूछा तो उसने  बताया कि  शद्र राजा से दान  लेने में नहाना जरूरी नहीं .  शाहू जी बोले वे शिवाजी के वंशज क्षत्रियहैं उसने कहा शिवाजी  एक  शूद्र कुनबी किसान का बेटा  अक्षत्रिय राजा था  ब्राह्मण समाजऔर शंकराचार्य की मान्यता बिना किसी को क्षत्रियनहीं माना जाएगा
राजाजीसदमा से उठे और देखा कि उनके ७१ पदाधिकारियों में  से  ६१ब्राह्मण थे १९०२ में उन्होंने अब्राह्मण केलिए  ५०  प्रतिशत आरक्षण दिया  अपने कोल्हापुर राज्य में  इसलिए उन्हें आरक्षण का जनक कहा जाता है.उन्होंने जनेऊ छोडा़,व्रत संस्कार छोड दिया. मठकी संपत्ति जप्त कर  साधारण वर्गों की  शिक्षा में विनीयोग किया  तिलक की पत्रिका केशरी ने उन्हें हिन्दू विरोधी बताया  उनको मारने के लिए उनकी कारपर बम फेका गया ,पर वे बच गए.
अखिल भारतीय कूर्मिक्षत्रिय महासभा  के १९१९  के  अधिवेशन में   उनको सभापति बनाकर  राजर्षि उपाधि  दिया गया .  क्या उनको ब्राह्मण पदोन्नति मिला ?
अरविंद स्वामी  विवेकानंद  आदि महामनिषियों  को भी शूद्र संतान कहा गया .  उनको ब्राह्मण पदोन्नति नहीं मिली. 
अभी मातृभूमि की  रक्षा के लिए शहीद  हे जीने वाले जवानों को  हिन्दू धर्म क्षत्रिय की मान्यता नहीं दे रहा है.
उत्तर भारत में एक कहावत  प्रचलित है :-
भले जात कुनबीन कि खुरपि  हाथ!
खेत निरावे अपने पी  के साथ !

कुर्मी (कुनबी ) औरतों का  अपने मरद के साथ  खेत में काम करना एक आम बात है.  इस  किसान जाति में  कोई कभी  राज, महाराजा हुए होंगे , कोई सिपाई सैनिक होंगे , आम कुर्मी तो  किसान ही है.  इन्हें कोई ब्राह्मण समाज या  शंकराचार्य ने  क्षत्रिय की मान्यता नहीं दी है.  अपने आप को  क्षत्रिय बोलने से, क्षत्रिय पदवी धारण करने से  बगैर क्षत्रिय संस्कार के  हिन्दू धर्म में क्षत्रिय की मान्यता  नहीं मिलने वाली है. 
कुर्मी और  जनेऊं (उपवीत ) :-
कुरमी सदर सभा के  संस्थापक सभापति  बाबू रामधीन सिंह चौधरी  १८९६ में  लखनऊ में जनेऊं पहने , तो ब्राह्मणों ने उनकाजनेऊं तोड़  डाला.  ऐसे कुर्मियों का जनेऊं  गोण्डा में १९०९ में,  बाराबंकी में १९२५ मे,  आजमगढ़ में १९२६ में, पश्चिम बंगाल में २९२९ में तोडा़ गया .  बंगाल को नौपाडा गांव के एक शिक्षक  कुंज महतो  जनेऊं पहनकर  वागदा दुर्गा पूजा  देखने गए .  ब्राह्मणों ने  उन्हें पकड़कर जनेऊं काट दिया , गंजा बनाया और  मुंह में कालीख पेतकर  घुमाया.  मामला केर्ट में पहुंचा . ब्राह्मण विचारपीठ ने  अपराधीको पच्चीसरुपए  जुर्मानाकरके छोड दिया. इसकी प्रतिक्रियामें  कुर्मियों में जनेऊं पहनने का  होड लग गया ,परन्तु धारण करने पर  सामाजिक स्थिति नहीं बदली तो  मोह भंग हो गया.
शूद्र का वर्गीकरण :-
शूद्र का ३ वर्गों में  वर्गीकरण  किया गया है -१-  जलचल -  जिनका पका अन्न , जल भोज्य है.
२- अचल - जिनका  पकीयी खाना ऐर जल  अग्रहणीय,  किन्तु उनका पुरोहित होते हैं
३- अछूत- छूते नहीं हैं तो  उनका पुरोहित बनने का तो  सवाल ही नहीं.

व्यास स्मृति के अनुसार  कुर्मी तीसरे का ान का शूद्र था.  फिर सनातन धर्म बदला . उनके पिता के नाम  की स्मृति  पराशर स्मृति  में कुर्मी को दूसरे पायदान के शूद्र पर पदोन्नति हुई.  यथा -
आभीर: कुर्मणा लोद्र:  कैवर्त च नापिता: !पंच शूद्रा  प्रशश्यते  षपठोपिद्विज  सेविका: !!
अहीर, कुर्मी, लोध, कैवर्त और नाई ये पांच शूद्र द्विजों्की  मन से सेवा करने  के कारण  प्रशंसनीय हैं .
पराशर -स्मृति कहता है - पतितौपि द्विजो श्रेष्ठ:  नच शूद्रो जितेन्द्रिय:!
  आओ कुर्मी संतानों !  देखो ,  पढो़ वर्ण -व्यवस्था तुम्हारा क्या हाल किया है  तो उस व्यलस्था का समर्थक बनकर  क्यों उसके दूसरे वर्ण क्षत्रिय  की मरीचिका के पीछे दौड़ लगा रहे हो!
   इस क्षत्रिय और शूद्र पुंछ को काटकर फेको और आगे बढो़!
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